SoapNuts : जब नहीं था साबुन कैसे नहाते थे लोग ?
Shikakai, often referred to as the "hair fruit," was a significant part of traditional methods for cleansing the hair.
SoapNuts : जब नहीं था साबुन कैसे नहाते थे लोग ? :- आधुनिक साबुन के बाथरूम की अलमारी में जगह बनाने से काफी पहले भारत के लोग निजी साफ-सफाई की कला में माहिर हो चुके थे. लेकिन सवाल यह उठता है कि जब साबुन नहीं था तब भारत के लोग किस चीज का इस्तेमाल करके नहाते थे. आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब।
रीठा यानी कि सोप नट प्राचीन भारत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले प्राकृतिक क्लींजर में से एक था. जब इसे पानी में भिगोया या फिर उबाला जाता था तो यह साबुन जैसा ही प्राकृतिक झाग बनाता था. इससे यह बिना किसी तेज केमिकल के त्वचा और बालों को साफ करने के लिए सही था।
शिकाकाई जिसे अक्सर बालों का फल भी कहा जाता है, बालों को साफ करने के पारंपरिक तरीकों का एक बड़ा हिस्सा था. यह गंदगी और ज्यादा तेल को असरदार तरीके से हटाता था. इसी के साथ यह सिर की त्वचा का प्राकृतिक संतुलन भी बनाए रखता था।
बेसन, हल्दी, चंदन और दूध या फिर मलाई को मिलाकर एक उबटन तैयार किया जाता था. इसका इस्तेमाल नहाने के लिए किया जाता था. यह ना सिर्फ त्वचा को साफ करता था बल्कि रंगत भी निखारता था.मुल्तानी मिट्टी का इस्तेमाल तेल सोखने और त्वचा को शुद्ध करने के लिए किया जाता था. गांव में लकड़ी की राख को भी इस्तेमाल किया जाता था।
एक लोकप्रिय पारंपरिक तरीका यह था कि शरीर की तेल से मालिश की जाती थी. इसके बाद जड़ी बूटियों के पाउडर या फिर मिट्टी से रगड़कर उसे साफ किया जाता था. आधुनिक साबुन 19वीं सदी के आखिर में भारत में आया. जब लीवर ब्रदर्स जैसी कंपनियों ने लाइफबॉय जैसे उत्पाद पेश किए. भारत की पहली साबुन फैक्ट्री 1897 में मेरठ में स्थापित की गई थी. बाद में जमशेदजी टाटा और अर्देशिर गोदरेज प्ले स्वदेशी और वनस्पति आधारित साबुन विकसित किए।



