RaoBilawar : चुनावी हार-जीत से अलग: राव बिलावर ने बनाई दिलों में जगह
A unique example of a young face in the Uttarakhand Bar Council elections.
RaoBilawar : चुनावी हार-जीत से अलग: राव बिलावर ने बनाई दिलों में जगह :- उत्तराखंड की राजनीति हमेशा से ही उत्साहपूर्ण और प्रतिस्पर्धी रही है, खासकर अधिवक्ता समुदाय के चुनावों में। यहां बड़े-बड़े दिग्गज मैदान में उतरते हैं, जहां हर वोट एक रणनीति और हर बहस एक हथियार बन जाती है। लेकिन हालिया अधिवक्ता परिषद चुनाव में एक ऐसा नाम उभरा, जिसने न सिर्फ अपनी अलग पहचान बनाई, बल्कि हार-जीत के परे लोगों के दिलों में जगह कमा ली।
हम बात कर रहे हैं युवा अधिवक्ता राव बिलावर की। वैसे तो यह चुनाव बड़े-बड़े किलों के ढहने का गवाह बना, मगर राव बिलावर की मजबूत मौजूदगी ने सबको हैरान कर दिया। उनकी हार की चर्चा आज जीत से कहीं ज्यादा हो रही है—यह एक जीती हुई हार है!
बिना बड़े ग्रुप के मैदान में अकेले योद्धा
अधिवक्ता राजनीति में तो बड़े-बड़े दिग्गज चुनावी रण में तलवारें भांजते नजर आते हैं। अनुभवी नेता, मजबूत गुटबाजी और लंबे राजनीतिक अनुभव वाले चेहरे यहां का आलम हैं। मगर राव बिलावर ने इस सबके बीच एकदम अकेले, बिना किसी बड़े राजनीतिक ग्रुप या जोड़-तोड़ के मैदान संभाला।
104 प्रतियोगियों के बीच, जहां हर खिलाड़ी अपनी चालें चला रहा था, राव ने सिर्फ अपनी मेहनत और सिद्धांतों पर भरोसा किया। उनका “चुनाव में साफ कहना था, मदिरा के संग चुनाव में नहीं रहना” बेहद प्रचलित हो गया। यह नारा न सिर्फ मजेदार था, बल्कि उनके साफ-सुथरे चरित्र को दर्शाता था। मदिरा से दूरी का संदेश उन्होंने व्यवहार से दिया, जो उत्तराखंड के अधिवक्ता भाइयों के बीच खूब गूंजा।
यह पहला ही चुनाव था राव का, फिर भी उन्होंने 78वीं रैंक हासिल की। 3400 से अधिक वोट मिले—यह कोई छोटी बात नहीं! अगर क्रिकेट की भाषा में कहें तो वे पूरे टूर्नामेंट के मैन ऑफ द सीरीज साबित हुए। बड़े दिग्गजों के किले ढहते नजर आए, जहां अनुभवी नेता भी पिछड़ गए, वहां राव बिलावर की यह उपलब्धि एक मिसाल है। लास्ट के पांच दिनों तक गिनती में बने रहना खुद में एक बड़ी जीत है।
उत्तराखंड भर में बनी खास पहचान
राव बिलावर ने सिर्फ चुनावी मैदान ही नहीं, बल्कि समस्त उत्तराखंड के अधिवक्ता समुदाय के दिलों में जगह बना ली। युवा चेहरा होने के नाते वे नई पीढ़ी के प्रतिनिधि बने। “राव ने साबित कर दिया कि सिद्धांतों की राजनीति अभी जिंदा है,” उनकी मेहनत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बिना किसी बड़े समर्थन के उन्होंने पूरे राज्य में घूम-घूम कर अधिवक्ताओं से जुड़ाव बनाया।
गौरतलब है कि उत्तराखंड भर के अधिवक्ताओं ने राव बिलावर को अपने दूसरे, तीसरे, चौथे, पांचवें मत में जगह दी। यह विश्वास का प्रमाण है कि वे लोकप्रिय थे। मगर घरेलू मतों में प्रथम स्थान न मिल पाने से राह मुश्किल हो गई। फिर भी, यह हार नहीं, बल्कि एक मजबूत नींव है।
हार में छिपी बड़ी जीत: एक प्रेरणा
चुनावी राजनीति में हार-जीत तो चलती रहती है, मगर राव बिलावर ने साबित किया कि असली जीत दिलों में बसने की होती है। बड़े दिग्गजों के किले ढहने के दौर में उनकी 78वीं रैंक और 3400 वोट मेहनत का फल हैं।
लास्ट फाइव डेज तक गिनती में टिके रहना किसी कमजोर खिलाड़ी की पहचान नहीं। यह एक युवा की ताकत दिखाता है, जो सिद्धांतों से समझौता नहीं करता। उनका “मदिरा से दूरी” वाला संदेश आज भी वायरल है, जो अधिवक्ता समुदाय में नैतिकता की बहस छेड़ रहा है।
उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहां अधिवक्ता परिषद चुनाव स्थानीय शासन और न्याय व्यवस्था को प्रभावित करते हैं, ऐसे युवा चेहरे जरूरी हैं। राव बिलावर ने न सिर्फ अपनी पहचान बनाई, बल्कि आने वाली पीढ़ी को संदेश दिया—बिना जोड़-तोड़ के भी सफलता संभव है। आज उनकी हार की चर्चा जीत से ज्यादा इसलिए हो रही है क्योंकि यह हार नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। भविष्य के चुनावों में वे और मजबूत लौटेंगे, यही सबकी उम्मीद है।




